जांजगीर चाम्पा - श्रृंगी ऋषि के श्राप को पूरा करने के लिये तक्षक नामक सांप भेष बदलकर राजा परिक्षित के पास पहुँचकर उन्हें डस लेते हैं जिससे जहर के प्रभाव से राजा का शरीर जल जाता है और मृत्य हो जाती है। लेकिन श्रीमद्रागवत कथा सुनने के प्रभाव से राजा परीक्षित को मोक्ष है। प्राप्त होता परीक्षित को जब मोक्ष हुआ तो ब्रह्माजी ने अपने लोक में तराजू के एक पलड़े में सारे धर्म और दूसरे में श्रीमद्भागवत को रखा तब भागवत का ही पलड़ा भारी रहा। अर्थात श्रीमद्रागवत ही सारे वेद पुराण शास्त्रों का मुकुट है , कथा के श्रवण प्रवचन करने से जन्म जन्मांतरों के पापों का नाश होता है और विष्णुलोक की प्राप्ति होती है।
उक्त बातें मां शंवरीन दाई की पावन धरा अमोरा (महन्त) के नवा तालाब पारा में स्थापित पंचमुखी हनुमानजी की असीम कृपा से आयोजित संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा के विश्राम दिवस आज कथा व्यास दीदी हेमलता शर्मा (पाली - कोरबा निवासी) ने श्रोताओं को कथा सुनाते हुये कही। उन्होंने कहा श्रीमद्भागवत कथा को अमर कथा माना गया है , यह कथा हमें मुक्ति का मार्ग दिखलाती हैं। जो जीव श्रद्धा और विश्वास के साथ मात्र एक बार इस कथा को श्रवण कर लेता है उनका जीवन सुखमय हो जाता है और वह सदैव के लिये मोक्ष की प्राप्ति कर लेता है और उसे सांसारिक बंधनों के चक्कर मे आना नही पड़ता। इस कलिकाल में मोक्ष दिलाने वाला श्रीमद्रागवत महापुराण कथा से कोई अन्य श्रेष्ठ मार्ग नही है। कथाव्यास ने बताया कि परीक्षित को ऋषि पुत्र द्वारा सातवें दिन मरने का श्राप दिया गया था। उन्होंने अन्य उपाय के बजाए श्रीमद्भागवत की कथा का श्रवण किया और मोक्ष को प्राप्त कर भगवान के बैकुण्ठ धाम को चले गये। ऐसे श्रीमद्रागवत कथा श्रवण करने का सौभाग्य केवल श्रीकृष्ण की असीम कृपा से ही प्राप्त हो सकती है। कथा सुनाने के बाद श्रीशुकदेव जी ने राजा परिक्षित को पूछा राजा मरने से डर लग रहा हैं क्या ? तब राजा ने कहा महाराज मृत्यु तो केवल शरीर की होती हैं आत्मा तो अमर होती हैं भागवत कथा सुनने के बाद अब मेरा मृत्य से कोई डर नही हैं और अब मैं भगवत प्राप्ति करना चाहता हूँ। मुझे कथा श्रवण कराने वाले सुकदेवजी आपकों कोटि-कोटि मेरा प्रणाम कहकर परिक्षित ने श्रीशुकदेव जी को विदा किया। इसके बाद तक्षक सर्प आया और राजा परीक्षित के शरीर को डसकर लौट गया। परीक्षित की आत्मा तो पहले ही श्रीकृष्ण की चरणारविन्द में समा चुकी थी और कथा के प्रभाव से अंत में उन्हें मोक्ष प्राप्त हो गया। कथाव्यास ने बताया कि इस कलयुग में भी मनुष्य श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण कर अपना कल्याण कर सकता है। इस कलिकाल में भी वह भगवान के नाम स्मरण मात्र से भगवत् शरणागति की प्राप्त कर अपने जीवन को धन्य बना सकता है। इसके पहले व्यासाचार्य ने सुदामा चरित्र की कथा पर प्रकाश डालते हुये कहा कि सुदामा संसार में सबसे अनोखे भक्त रह हैं। वे जीवन में जितने गरीब नजर आये , उतने ही वे मन से धनवान थे। उन्होंने अपने सुख व दुखों को भगवान की इच्छा पर सौंप दिया था। जब सुदामा द्वारिकापुरी पहुंचे तो द्वारपाल के मुख से सुदामा का नाम सुनते ही द्वारिकाधीश नंगे पांव मित्र की अगुवानी करने राजमहल के द्वार पर पहुंचे। बचपन के मित्र को गले लगाकर भगवान श्रीकृष्ण उन्हें राजमहल के अंदर ले गये और अपने सिंहासन पर बैठाकर स्वयं अपने हाथों से उनके पांव पखारे। कथाव्यास ने कहा कि सुदामा से भगवान ने मित्रता का धर्म निभाया और दुनियां के सामने यह संदेश दिया कि जिसके पास प्रेम धन है वह निर्धन नहीं हो सकता। राजा हो या रंक मित्रता में सभी समान हैं और इसमें कोई भेदभाव नहीं होता। मनुष्य को जीवन में श्रीकृष्ण की तरह मित्रता निभानी चाहिये। इसी के साथ व्यासाचार्य ने भगवान श्रीकृष्ण के स्वधाम गमन की कथा भी सुनाई। कथा के अंतिम दिन श्रोताओं की खूब भीड़ रही। इस दिन नवागढ़ जनपद पंचायत सभापति श्रीमति आरती तिवारी विशेष रूप से उपस्थित थीं। श्रीमद्भागवत कथा का विश्राम राजा परीक्षित के मोक्ष प्रसंग के साथ हुआ , इस दौरान सभी हरिभक्तों ने कथा श्रवण कर चढ़ोत्री में भाग लिया।