जांजगीर चाम्पा - श्रीराम कथा के श्रवण मात्र से मन के सारे क्लेश एवं दुख दूर हो जाते हैं। कथा के जरिये हम भगवान को प्राप्त कर सकते हैं। मानव जन्म से हम स्वर्ग को जा सकते हैं यानि इस देह से ही हमें छुटकारा मिल सकता है। हमें हर क्षण भगवान का कीर्तन करते रहना चाहिये। मानव मोह माया में फंसकर यह भूल जाता है कि उसका जन्म किसलिये हुआ है। ऐसे में वह अपने जन्म का उद्देश्य पूरा नहीं कर पाता है।
उक्त बातें मां शंवरीन दाई की पावन धरा अमोरा (महन्त) के नावा तालाब पारा में हनुमत प्राकट्योत्सव के अवसर पर पंचमुखी हनुमानजी की प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर आयोजित सार्वजनिक संगीतमय श्रीराम कथा के विश्राम दिवस पं० रामायण प्रसाद शर्मा सकरेली (सक्ती) ने श्रद्धालुओं को कथा श्रवण कराते हुये कही। इसके मुख्य यजमान राधाबाई कृष्ण कुमार कश्यप रहे। भगवान के प्राकट्य के कारण का उल्लेख करते हुये उन्होंने कहा कि जब -जब होई धरम की हानि , बाढ़हि असुर अधम अभिमानी। तब-तब धरि प्रभु विविध शरीरा , हरहि दयानिधि सज्जन पीरा।। अर्थात जब-जब पृथ्वी पर धर्म की हानि होती है और दुष्टों का प्रभाव बढ़ने लगता है , तब सज्जनों की पीड़ा हरने के लिये करूणानिधान प्रभु श्रीराम काल - समय और परिस्थिति के अनुसार अलग - अलग रूपों में प्रकट होते हैं। महाराजश्री ने सेतुबंध बांध का कथा श्रवण कराते हुये बताया कि जब लंका विजय के लिए समुद्र पार करना जरूरी हुआ तब भगवान राम ने समुद्र देव का आह्वान किया था। तब समुद्र ने प्रगट होकर नल-नील के शाप का जिक्र करते हुये सेतु का उपाय सुझाया। इसके बाद वानर सेना की सहायता से नल व नील ने पत्थरों पर भगवान राम का नाम लिखकर उनसे लंका तक सेतु बना दिया और यही सेतु रामसेतु कहलाता है। जिससे पार करके स्वयं भगवान श्रीराम और उनकी पूरी सेना लंका पहुंची। उन्होंने बताया कि श्रीलंका में पाप और पुण्य के बीच तथा धर्म और अधर्म के बीच युद्ध शुरू हुआ और रण में एक-एक कर रावण के सभी पूर्वजों और भाईयों का नाश होने लगा। अंतत: जब सेना कम पड़ी तो रावण ने श्रीराम प्रभु की सेना को नष्ट करने के लिये छह माह सोने वाले भाई कुंभकर्ण को असमय ही जगाया। यह प्रयास भी निर्थक साबित हुआ और कुंभकर्ण को भी वीरगति प्राप्त हुई। महाराजश्री ने आगे का प्रसंग सुनाते हुये कहा कि रावण ने फिर मेघनाद को युद्ध भूमि में भेजा। मेघनाथ के शक्तिबाण से लक्ष्मण बेहोश हो गये , उनका उपचार करने के लिये हनुमान विभीषण के कहने पर सुषेण वैद्य को भवन सहित उठा लाये। उन्होंने सूर्योदय से पहले हनुमान से संजीवनी लाने को कहा। इस पर हनुमानजी पूरा का पूरा पहाड़ ही उठा लाये। संजीवनी के उपचार से लक्ष्मण को होश आया। इसके बाद उन्होंने मेघनाद का वध कर दिया। आखिर में स्वयं रावण युद्ध भूमि में आया और राम का प्रताप देख वह आकाशमार्ग में पहुंच गया जहां पहुंचकर प्रभु श्री राम ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर उसकी नाभि का अमृत सोख लिया और उसका वध कर दिया। रावण वध का प्रसंग सुनते ही भक्तजन भाव-विभोर हो उठे और पूरा आयोजन स्थल प्रभु श्रीराम के जयकारों से गूंज उठा। इसके पश्चात आचार्य श्री ने भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक की कथा सुनाते हुये बताया कि लंका पर विजय प्राप्त कर भगवान राम सिया संग अवधपुरी लौटे हैं। संग में लखन लाल , विभीषण , हनुमान , अंगद , जामवंत सहित पूरे परिवार हैं भैया भरत को देखकर प्रभु श्रीराम भाव-विभोर हो रहे हैं। अयोध्या के जितने भी नर-नारी , बालक , वृद्ध भगवान श्रीराम को देखकर खुश हो रहे हैं। वशिष्ठ जी आये हैं और प्रभु राम को ऊंचे स्थान पर बिठाकर राज्याभिषेक किये हैं। इसी कड़ी में कथा महोत्सव में भगवान का राज्याभिषेक किया गया और चढ़ोत्री के पश्चात श्रीराम कथा को विश्राम दिया गया। कथा के विश्राम दिवस पुरी शंकराचार्य स्वामी श्री निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज के मीडिया प्रभारी अरविन्द तिवारी, गौ सेवा संगठन छत्तीसगढ़ के प्रदेश सचिव योगेश तिवारी विशेष रूप से उपस्थित थे। इसमें कथा आयोजन समिति के राजू पटेल , सुमेंद पटेल , कृष्ण कुमार कश्यप , विक्रम पटेल , मनीराम कश्यप , भास्कर पटेल , साकेत पटेल और व्यासनारायण कश्यप सहित सभी सदस्यों का सराहनीय योगदान रहा।