भगवन्नाम संकीर्तन से मिलता है मोक्ष – मोहन नारायण शास्त्री


अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट 

वृंदावन – भगवान के नाम में इतने पापों को काटने की शक्ति है , जितने पाप मनुष्य कर भी नहीं सकता। भगवान की शरण में रहने वाले विरले भक्तों के पाप श्री भगवान के नामोच्चारण से ही नष्ट हो जाते हैं। बड़े से बड़े पापों का सर्वोत्तम , अंतिम और पाप वासनाओं को भी निर्मूल कर डालने वाला प्रायश्चित यही है कि केवल श्रीभगवान के गुणों , लीलाओं और नामों का कीर्तन किया जाये।                                                   
        उक्त बातें पुरूषोत्तम मास के पावन अवसर पर श्री धाम वृंदावन परिक्षेत्र छटीकरा स्थित लड्डू गोपाल आश्रम में हिंगलाज सेना छत्तीसगढ़ के तत्वाधान में आयोजित संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस कथाव्यास पं० मोहन नारायण शास्त्री ने कही।‌ उन्होंने कहा जैसे जाने या अनजाने में ईंधन से अग्नि का स्पर्श हो जाये तो वह भस्म हो ही जाता है , वैसे ही जान बूझकर या अनजाने में भगवान के नामों का संकीर्तन करने से मनुष्य के सारे पाप भस्म हो जाते हैं। जैसे कोई परम शक्तिशाली अमृत को उसका गुण ना जान कर अनजाने में पी ले , तो भी अमृत उसे अमर बना ही देता है वैसे ही अनजाने में उच्चारण करने पर भी भगवान का नाम अपना फल देकर ही रहता है। कथाव्यस ने अजामिल कथा का श्रवण कराते हुये कहा कि दुष्ट एवं दुराचारी होने के बावजूद संतों की एक दिन की संगत से मोक्ष की प्राप्ति होती है। आगे उन्होने अजामिल की कथा में बताया कि वह एक ब्राह्मण था जो शास्त्रज्ञ , शील , सदाचार और सदगुणों में निपुण था लेकिन वह भी माया के जाल में आकर अपने धर्म से भटक गया। भागवताचार्य ने बताया कि अजामिल कान्यकुब्ज ब्राह्माण कुल में जन्मे थे और कर्मकाण्डी थे। एक दिन वे नर्तकी वेश्या को अपने घर ले आये और उसकी इच्छाओं को पूरा करने के लिये धन प्राप्ति के उद्देश्य से वह तरह – तरह के दुष्कर्मों में लिप्त हो गया। इस तरह से अजामिल को नौ पुत्र प्राप्त हुये तथा दसवीं संतान उसके गर्भ में थीं। कुछ समय पश्चात एक दिन संतों का एक काफिला अजामिल के गांव से गुजर रहा था तो शाम होने पर संतों ने अजामिल के घर के सामने डेरा जमा दिया। रात में जब अजामिल आया तो उसने साधुओं को अपने घर के सामने देखकर साधुओं को भला बुरा कहने लगा। इस आवाज को सुन कर अजामिल की पत्‍‌नी ने पति को डांटते हुये शांत कर दिया। अगले दिन साधुओं ने अजामिल से दक्षिणा मांगी , इस पर वह फिर बौखला गया और साधुओं को मारने के लिये दौड़ पड़ा। तभी पत्‍‌नी ने उसे रोक दिया। साधुओं ने कहा कि हमें रुपया पैसा नहीं चाहिये। साधुओं ने कहा कि वह अपने होने वाले पुत्र का नाम तुम नारायण रख ले , बस यही हमारी दक्षिणा है। अजामिल की पत्‍‌नी को पुत्र पैदा हुआ तो अजामिल ने उसका नाम नारायण रख लिया और नारायण से प्रेम करने लगा। इसके बाद जब अजामिल का अंत समय आया तो उसे अति भयानक यमदूत दिखलाई पड़े। भय और मोहवश अजामिल अत्यंत व्याकुल हुआ। अजामिल ने दु:खी होकर नारायण ! नारायण ! पुकारा। भगवान का नाम सुनते ही विष्णु पार्षद उसी समय उसी स्थान पर दौड़कर आ गये। यमदूतों ने जिस पाश से अजामिल को बांधा था , पार्षदों ने उसे तोड़ डाला। यमदूतों के पूछने पर पार्षदों ने धर्म का रहस्य समझाया। यमदूत नहीं माने और वे अजामिल को पापी समझकर अपने साथ ले जाना चाहते थे। तब पार्षदों ने यमदूतों को डांटकर वहाँ से भगा दिया और अजामिल तत्काल भगवान के पार्षदों के साथ स्वर्णमय विमान पर आरूढ़ होकर आकाशमार्ग से भगवान लक्ष्मीपति के निवास स्थान बैंकुठ को चला गया।इधर हारकर सब यमदूतों ने यमराज के पास जाकर पुकार की। तब धर्मराज ने कहा कि तुम लोगों ने बड़ा अपराध किया है। अब सावधान रहना और जहाँ कहीं भी कोई भी किसी भी प्रकार से भगवान के नाम का उच्चारण करे , वहाँ मत जाना। इसलिये कहा गया है कि भगवान का नाम लेने से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। इसी कड़ी में कथाव्यास ने ध्रुव चरित्र के माध्यम से बताया एक बार राजा उत्तानपाद अपने पुत्र उत्तम को अपनी गोद में लिये सिंहासन पे बैठे थे। ध्रुव ने देखा तो उसकी भी इच्छा हुयी अपने पिता के गोद में बैठने की और वह धीरे-धीरे अपने पिता के करीब पहुँच गया। पिता ने डर से छोटी रानी की ओर देखा पर सुरुचि ने मना कर दिया। सुरुचि ने कहा कि अगर तू राजा की गोद में बैठना चाहता है तो तुझे मेरी कोख से जन्म लेना होगा और इसके लिये तुझे भगवान की तपस्या करनी होगी। बालक ध्रुव को यह बात चुभ जाती है और वह वन में जाकर कठिन तपस्या करने लगते हैं। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु उन्हें दर्शन देते हैं और उन्हें मनचाहा वरदान देने का वचन देते हैं। इसी तरह सती प्रसंग पर प्रकाश डालते हुये महाराजश्री ने बताया किसी भी स्थान पर बिना निमंत्रण जाने से पहले इस बात का ध्यान जरूर रखना चाहिये कि जहां आप जा रहे हैं वहां आपका , अपने इंष्ट या अपने गुरु का अपमान ना हो – यदि ऐसा होने की आशंका हो तो उस स्थान पर जाना नहीं चाहिये। चाहे वह स्थान अपने जन्मदाता पिता का ही घर क्यों ना हो। कथा के दौरान सती चरित्र के प्रसंग को सुनाते हुए कहा कि भगवान शिव की बात को नहीं मानने पर सती को पिता के घर जाने से अपमानित होने के कारण स्वयं को अग्नि में स्वाह होना पड़ा। इस दौरान कथा के मुख्य यजमान श्रीमती अनीता प्रदीप शुक्ला बिलासपुर , श्रीमति दया शर्मा पत्नि स्व० बिजेन्द्र शर्मा वृंदावन सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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