रायपुर - आजकल विशेष रूप से युवाओं में बढ़ रहे फैटी लिवर के बारे में डॉ शुभम् भेंडारकर ने बताया की पिछले कुछ वर्षों में भारत ने एक खतरनाक स्वास्थ्य बदलाव देखा है। गैर-संचारी रोगों (NCDs) का बोझ अब बुजुर्गों से ट्रांसफर होकर सीधे कामकाजी युवाओं (20-40 वर्ष) पर आ गया है। भारतीय फिनोटाइप एशियाई भारतीयों में जेनेटिकली 'लीन मास' (मांसपेशियां) कम होती हैं और विसरल फैट (पेट के अंदरूनी अंगों के आसपास की चर्बी) अधिक होती है। इसे चिकित्सा विज्ञान में "थिन फैट इंडिया”कहा जाता है। यही कारण है कि सामान्य बीएमआई होने के बावजूद भारतीय युवाओं में मेटाबॉलिक बीमारियां जल्दी घर कर लेती हैं।चिकित्सा जगत में अब नॉन अल्कोहलिक लिवर डिजीस शब्द का इस्तेमाल बंद कर दिया गया है। डॉ शुभम् ने बताया की पैथोफिज़ियोलॉजी: 'ट्विन साइकिल' थ्योरी प्रोरोफेसर रॉय टेलर द्वारा प्रतिपादित यह थ्योरी स्पष्ट करती है कि टाइप-2 डायबिटीज और फैटी लीवर अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही मेटाबॉलिक खराबी के दो हिस्से हैं: लीवर चक्र अत्यधिक रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट और गतिहीन जीवनशैली के कारण लीवर में डी-नोवो लिपोजेनेसिस यानी नए फैट का निर्माण शुरू होता है। लीवर में फैट जमा होने से वहां इंसुलिन रेजिस्टेंस पैदा होता है। इसके कारण लीवर रात में ग्लूकोज का उत्पादन बढ़ा देता है, जिससे मरीज का 'फास्टिंग ब्लड शुगर' बढ़ने लगता है। पैंक्रियाज चक्र लीवर जब अपनी क्षमता से अधिक फैट जमा कर लेता है, तो वह इसे ट्राइग्लिसराइड्स के रूप में पैंक्रियाज (अग्न्याशय) की ओर भेजने लगता है। पैंक्रियाज में फैट का संचय होने से वहां मौजूद इंसुलिन बनाने वाली बीटा-कोशिकाएं -सुप्त अवस्था में चली जाती हैं। परिणामतः इंसुलिन का स्राव कम हो जाता है और पूर्ण रूप से टाइप-2 डायबिटीज स्थापित हो जाती है| शुरुआती लक्षण और उन्नत जांच चूंकि ये दोनों बीमारियां शुरुआती सालों में बिल्कुल शांत रहती हैं, इसलिए इनकी जल्द पहचान (ईए) ही एकमात्र उपाय है: क्लिनिकल मार्कर्स (शारीरिक संकेत) /एकांथोसिस निगरिकेंस गर्दन के पीछे, बगल या उंगलियों के पोरों की त्वचा का मखमली और काला पड़ जाना। यह शरीर में इंसुलिन की अत्यधिक मात्रा हाइपरिंसुलिनेमिया और रेजिस्टेंस का सबसे बड़ा व्यावहारिक संकेत है|भारतीय पुरुषों में \bm{>90} सेमी और महिलाओं में \bm{>80} सेमी होना विसरल मोटापे को दर्शाता है, भले ही उनका कुल वजन सामान्य हो। डॉ. शुभम् भेंडारकर के मुताबिक निष्कर्ष चिकित्सा जगत और स्वास्थ्य नीतियों के लिए एक महत्वपूर्ण 'कॉल टू एक्शन' होना चाहिए! ग्लूकोज-केंद्रित से मेटाबॉलिक-केंद्रित सोच: क्लिनिशियंस को केवल एचबीए१सी या ब्लड शुगर को दवाओं से दबाने के बजाय, मुख्य जड़ यानी 'इंसुलिन रेजिस्टेंस' और 'लीवर फैट' को ठीक करने पर ध्यान केंद्रित करना होगा। पॉलिसी लेवल पर बदलाव: आईटी सेक्टर्स और शैक्षणिक संस्थानों में युवाओं के लिए 'स्क्रीन टाइम रिस्ट्रिक्शन', 'स्टैंडिंग डेस्क' और अनिवार्य शारीरिक गतिविधि को नीतियों में शामिल करना होगा। यदि 30 वर्ष की उम्र में इस मूक महामारी (साइलेंट एपिडेमिक ) को नहीं रोका गया, तो यही युवा आबादी 45 वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते क्रिप्टोजेनिक सिरोसिस , किडनी फेलियर या असमय हार्ट अटैक का शिकार हो जाएगी।
फैटी लिवर से बचने के आसान उपाय -
बाहर का तला-भुना और ज्यादा तेल-मसाले वाला भोजन कम करें। रोजाना 30–40 मिनट तक टहलना या व्यायाम करें। वजन नियंत्रित रखें, मोटापा फैटी लिवर का मुख्य कारण है। शराब और धूम्रपान से पूरी तरह दूरी बनाएं। मीठे पेय, कोल्ड ड्रिंक और ज्यादा शक्कर वाली चीजें कम लें। हरी सब्जियां, सलाद, फल और फाइबर युक्त भोजन अधिक खाएं। पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। डायबिटीज, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर की नियमित जांच कराते रहें। बिना डॉक्टर की सलाह के दवाइयों का सेवन न करें। समय-समय पर लिवर की जांच करवाना जरूरी है। स्वस्थ खान-पान, नियमित व्यायाम और सही दिनचर्या से फैटी लिवर से बचाव संभव है।