आत्मकल्याण के लिये भगवन्नाम जप ही श्रेष्ठ साधन - पं० गौरव जोशी


अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट 

जांजगीर चाम्पा - भक्त ध्रुव की सौतेली मां सुरुचि के द्वारा अपमानित होने पर भी उसकी मां सुनीति ने धैर्य नहीं खोया जिससे एक बहुत बड़ा संकट टल गया। परिवार को बचाये रखने के लिये धैर्य संयम की नितांत आवश्यकता रहती है। भक्ति के लिये कोई उम्र बाधा नहीं है। भक्ति को बचपन में ही करने की प्रेरणा देनी चाहिये क्योंकि , बचपन कच्ची मिट्टी की तरह होता है। उसे जैसा चाहे वैसा पात्र बनाया जा सकता है। आत्म कल्याण के लिये भगवान नाम जाप के अलावा कुछ और साधन नहीं है , निरंतर भगवान का जाप करें चाहे आप किसी भी अवस्था में हो।                                                        
                                              उक्त बातें समीपस्थ ग्राम भड़ेसर (भांठापारा) में स्मृतिशेष नर्मदा प्रसाद उपाध्याय एवं हेमनलिनी उपाध्याय के पुण्यतिथि पर आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञानयज्ञ के तृतीय दिवस कथाव्यास पं० गौरव जोशी ने कही। इस कथा के मुख्य यजमान श्रीमति रोशनी राकेश उपाध्याय हैं और यह कथा प्रतिदिन दोपहर तीन बजे से प्रवाहित हो रही है। उन्होंने ध्रुव चरित्र के माध्यम से इस बात को विस्तार से समझाते हुये बताया राजा उत्तानपाद की दो पटरानियाँ थीं- सुनीति और सुरुचि। सुनीति के पुत्र का नाम ध्रुव रखा गया और सुरूचि के पुत्र का नाम उत्तम। राजा की आसक्ति नीति में कम और रूचि में अधिक थी इसलिये उनका नाम उत्तानपाद हुआ। ध्रुव जो है वो उत्तम से बड़ा थे। एक बार की बात है , राजा अपने पुत्र उत्तम को अपनी गोद में लिये सिंहासन पे बैठे थे। ध्रुव ने देखा तो उसकी भी इच्छा हुयी अपने पिता के गोद में बैठने की और वह धीरे-धीरे अपने पिता के करीब पहुँच गया। पिता ने डर से छोटी रानी की ओर देखा पर सुरुचि ने मना कर दिया। सुरुचि ने कहा कि अगर तू राजा की गोद में बैठना चाहता है तो तुझे मेरी कोख से जन्म लेना होगा और इसके लिये तुझे भगवान की तपस्या करनी होगी। बालक ध्रुव को यह बात चुभ जाती है और वह वन में जाकर कठिन तपस्या करने लगते हैं। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु उन्हें दर्शन देते हैं और उन्हें मनचाहा वरदान देने का वचन देते हैं। इस प्रसंग से यह शिक्षा मिलती है कि किसी में भेदभाव नहीं करना चाहिये और प्रभु की भक्ति में कोई विघ्न नहीं डालना चाहिये। इसके पहले सती प्रसंग पर प्रकाश डालते हुये महाराजश्री ने बताया किसी भी स्थान पर बिना निमंत्रण जाने से पहले इस बात का ध्यान जरूर रखना चाहिये कि जहां आप जा रहे हैं वहां आपका , अपने इंष्ट या अपने गुरु का अपमान ना हो -  यदि ऐसा होने की आशंका हो तो उस स्थान पर जाना नहीं चाहिये। चाहे वह स्थान अपने जन्मदाता पिता का ही घर क्यों ना हो। कथा के दौरान सती चरित्र के प्रसंग को सुनाते हुए कहा कि भगवान शिव की बात को नहीं मानने पर सती को पिता के घर जाने से अपमानित होने के कारण स्वयं को अग्नि में स्वाह होना पड़ा। महाराजश्री ने स्पष्ट शब्दों में इस बात पर जोर देते हुये कहा कि हर समाज में भागवत की कथा अब होनी चाहिये समाज सुधार के लिये कथा अत्यंत आवश्यक है। कथा आयोजक उपाध्याय परिवार ने सभी श्रद्धालुओं से उचित समय पर पाण्डाल में पहुंचकर कथा श्रवण करते हुये पुण्य लाभ अर्जित करने की अपील की है।

Likesh khunte

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