संस्मरणदो बुजुर्ग, दो जीवंत मिसालें .....

वक्त की धूल अक्सर यादों को धुंधला कर देती है, लेकिन कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जो समय की रेत पर अपने पदचिन्ह इतनी गहराई से छोड़ जाते हैं कि वे प्रेरणा का शाश्वत स्रोत बन जाते हैं। आज दिल के झरोखे से दो ऐसे ही बुजुर्गों की यादें ताजा हो रही हैं, जिनका जीवन ही उनका संदेश था।
दादा जी: क्रियाशीलता के वटवृक्ष
पहले व्यक्तित्व हैं श्री नंदकिशोर शुक्ल जी। वे मेरी धर्मपत्नी के दादा जी थे, जिन्होंने लगभग सौ वर्षों का एक लंबा और सार्थक सफर तय किया। सौ वर्ष की आयु सुनना जितना सुखद है, उसे उसी जीवटता के साथ जीना उतना ही कठिन। दादा जी खुशमिजाज तो थे ही, साथ ही गांव की सामाजिक एकता की धुरी भी थे। किसी के घर शहनाई बजवानी हो या किसी का झगड़ा शांत कराना हो, दादा जी हमेशा अग्रिम पंक्ति में खड़े मिलते।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी—अंतिम सांस तक कर्मयोग। वे घर के आसपास औषधीय और फलदार वृक्षों को अपनी संतानों की तरह सींचते थे। मुझे आज भी वह प्रसंग याद आता है, जब घर की खपरैल मरम्मत हो रही थी। उनके पोते और मजदूर काम पर लगे थे, तभी लकड़ी की सीढ़ी के सहारे 90 पार के दादा जी भी ऊपर चढ़ गए। ससुर जी की नाराजगी और चिंता अपनी जगह थी, लेकिन दादा जी का वह उत्साह बताता था कि उम्र केवल एक संख्या है, असली ताकत तो मन के भीतर का साहस है। वे भोजन प्रेम से करते थे और मन में कोई मैल नहीं रखते थे। शायद उनकी लंबी उम्र का राज यही था—हर हाल में सक्रिय रहना और प्रेम बांटना।

प्रेस के 'बाबा': स्वाभिमान और हुनर का संगम
दूसरी याद एक ऐसे 'मशीन मैन' की है, जिन्हें प्रेस जगत में लोग सम्मान से 'बाबा' पुकारते थे। बाबा और उनके मुंह में दबा पान—यही उनकी पहचान थी। काम के प्रति उनका समर्पण ऐसा कि मशीन भी उनके हाथों में सुरीली लगने लगती।
एक दिन रास्ते में उनसे मुलाकात हुई तो उनके चेहरे पर थोड़ी खिन्नता थी। वजह थी—मालिक की कोई कड़वी बात। बाबा का स्वाभिमान हिल गया था। उन्होंने बड़े गर्व से कहा था, "काम की कमी नहीं है, मेरा काम चोखा है।" उस उम्र में भी उनका यह भरोसा कि वे दूसरे शहर जाकर भी काम कर सकते हैं, आज के युवाओं के लिए एक मिसाल है। मैंने उन्हें समझाया कि मालिक उन्हें अपना ही मानते हैं और उसी अधिकार से डांट दिया होगा। वे मान तो गए, पर उनका वह आत्मविश्वास मेरे भीतर घर कर गया। कुछ ही दिनों बाद वे शांत हो गए, लेकिन अपनी जीवटता की अमिट छाप छोड़ गए।
वे दोनों बुजुर्ग आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी बातें अक्सर मेरे जहन में कौंधती हैं। एक ओर दादा जी का 'सामाजिक सेवा भाव' और 'शारीरिक श्रम' के प्रति लगाव था तो दूसरी ओर बाबा का अपने 'हुनर पर अडिग विश्वास।'
आज के इस दौर में, जहां छोटी-सी मुश्किल आने पर लोग हार मान लेते हैं, इन दोनों महानुभावों का जीवन हमें सिखाता है कि उत्साह और जीवटता ही वह 'अमृत' है, जो इंसान को जीते जी अमर बना देता है।
राजकुमार धर द्विवेदी 
वरिष्ठ पत्रकार रायपुर

Likesh khunte

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