शिव पार्वती विवाह में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़


अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट 

बिलासपुर - भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह प्रेम , तपस्या और आध्यात्मिक शक्ति का एक दिव्य संगम है। यह कथा हमें सिखाती है कि प्रेम में दृढ़ विश्वास होना चाहिये , अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिये समर्पित रहना चाहिये। इससे अंततः सत्य और साधना से हमारे जीवन में दिव्य प्रकाश का प्रवेश होता है। हिंदू धर्म में शिव और पार्वती के रिश्ते को सच्चे प्रेम , त्याग , एक-दूसरे के प्रति समर्पण और आध्यात्मिक जुड़ाव का सबसे उत्तम उदाहरण माना जाता है। शिव-पार्वती विवाह कथा एक दिव्य प्रेम गाथा है , माता पार्वती ने कठोर तप कर शिव को पति रूप में प्राप्त किया और भगवान शिव ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर विवाह स्वीकार किया। भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक माना जाता है। यह कथा सिर्फ धर्म के नजरिये से ही नहीं , बल्कि अच्छे वैवाहिक जीवन के आदर्श के रूप में भी देखी जाती है। शादीशुदा महिलायें माता गौरी और शिव-पार्वती की पूजा करके अपने पति की लम्बी उम्र और खुशहाल शादीशुदा जीवन की प्रार्थना करती हैं।                                            उक्त बातें कथाव्यास डॉ० नवीन पाठक ने नर्मदा भवन विसर्जन स्थल पचरीघाट जूना बिलासपुर में आयोजित श्री शिव महापुराण कथा में श्रद्धालुओं को कथाश्रवण कराते हुये कही। इस कथा के मुख्य यजमान श्रीमति झुनिया बाई किशनलाल कैवर्त और श्रीमति सरोजनी राजकुमार कैवर्त हैं। इसके पहले पार्वती जन्म का कथाश्रवण कराते हुये महाराजश्री ने कहा कि देवी पार्वती का जन्म पर्वतराज हिमालय और मैना के घर हुआ था , वे आदि पराशक्ति का अवतार थीं जो शिव से विवाह करने और एक महान योद्धा पुत्र को जन्म देने के लिये प्रकट हुईं। वे पूर्वजन्म में दक्ष प्रजापति की पुत्री सती थीं , जिन्होंने शिव के अपमान के कारण आत्मदाह कर लिया था और फिर हिमालय राज एवं माता मैना की तपस्या से प्रसन्न होकर मां जगदंबा पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया। उनकी तपस्या के बारे में महाराजश्री नझे बताया कि महादेव को पति रूप में पाने के लिये माता पार्वती ने हिमालय में अत्यंत कठोर तपस्या की , कई वर्षों तक अन्न-जल त्याग कर अत्यंत कठिन साधना की। तपस्या के दौरान भगवान शंकर ने पार्वती की परीक्षा लेने के लिये सप्तऋषियों को पार्वती के पास भेजा। उन्होंने पार्वती के पास जाकर उसे यह समझाने का प्रयास किया कि शिवजी औघड़ , अमंगल वेषधारी और जटाधारी हैं और वे तुम्हारे लिये उपयुक्त वर नहीं हैं। उनके साथ विवाह करके तुम कभी सुखी नहीं रह सकती , साथ ही माता पार्वती से ध्यान छोड़ने के लिये कहा। लेकिन पार्वती अपने विचारों पर दृढ़ रहीं। उनकी दृढ़ता को देखकर सप्तऋषि अत्यन्त प्रसन्न हुये और उन्हें सफल मनोरथ होने का आशीर्वाद देकर शिवजी के पास लौट आये। और अंत में शिव पार्वती विवाह कथा श्रवण कराते हुये कथाव्यास डॉ० नवीन पाठक ने बताया कि देवताओं ने पार्वती की तपस्या को सफल बनाने के लिये कामदेव को भेजा , ताकि वह शिव पर प्रेम बाण चलाकर उन्हें ध्यान से बाहर निकाल सकें। जब कामदेव ने प्रेम बाण चलाया , तो शिव की समाधि भंग हो गई। वे क्रोधित हो उठे और अपनी तीसरी आंख से कामदेव को भस्म कर दिया। लेकिन माता पार्वती के तप और समर्पण ने शिव का हृदय स्पर्श कर लिया। शिव ने पार्वती की भक्ति की परीक्षा लेने के लिये ब्राह्मण का रूप धारण किया और उनके पास पहुँचे। वे बोले - हे देवी ! तुम इतनी सुंदर और गुणी हो , फिर भी एक ऐसे योगी से विवाह करना चाहती हो जो गृहस्थ जीवन से दूर रहता है , जो वनवासी है और जिनके पास कोई वैभव नहीं। क्या यह तुम्हारे योग्य है ? इस पर पार्वती ने विनम्रता से उत्तर दिया - मैंने भगवान शिव को उनके तेज , त्याग , संयम और आध्यात्मिक शक्ति के कारण चुना है , ना कि उनकी बाहरी स्थिति या रूप देखकर। पार्वती की निष्ठा , स्पष्टता और गहराई से शिव अत्यंत प्रसन्न हो गये। उन्होंने अपना असली रूप प्रकट किया और पार्वती को अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लिया। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह अत्यंत भव्य रूप से सम्पन्न हुआ। इस दिव्य विवाह में सभी देवता , ऋषि-मुनि , गंधर्व और अप्सरायें शामिल हुये। समस्त प्रकृति और पंचमहाभूतों ने इस विवाह को सम्मान और आशीर्वाद प्रदान किया। यह विवाह केवल एक सांसारिक संबंध नहीं था , बल्कि शिव और शक्ति के अनंत , अपार और आध्यात्मिक मिलन का प्रतीक था। यह दिव्य संगम शिवलिंग और शक्ति के रूप में आज भी पूजनीय है और युगों-युगों तक इस प्रेम , तपस्या और समर्पण की कहानी को याद किया जाता है।



 कथा आयोजक राजकुमार केंवट ने जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी को बताया कि प्रतिदिन दोपहर तीन बजे प्रारंभ होने वाली कथा की अगली कड़ी में 21 दिसंबर रविवार को त्रिपुरासुर वध , जालंधर उद्धार और वृंदा चरित्र , 22 दिसंबर सोमवार को भगवान शिव के विभिन्न अवतारों का वर्णन और ज्योतिर्लिंग कथा होगी। वहीं 23 दिसंबर मंगलवार को शिव सहस्त्रनाम , हवन , पूर्णाहुति और सहस्त्रधारा कार्यक्रम सम्पन्न होगा। उन्होंने अधिक से अधिक श्रद्धालुओं से कथाश्रवण कर पुण्य लाभ अर्जित करने की अपील की है।

Likesh khunte

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