पिछले दिनों एक कवि-सम्मेलन में जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। देश के शीर्षस्थ कवियों की वाणी सुनने को मन व्याकुल था। कार्यक्रम का आरंभ सम्मान-सत्र से हुआ। संचालक ने नाम पुकारे, विशिष्टजन मंच पर आए, शॉल ओढ़ाई, चेहरे सामने करके तस्वीरें खिंचवाईं और गर्व से अपनी सीटों पर लौट गए। यह सामान्य क्रम चलता रहा।किंतु इसी बीच एक ऐसा दृश्य सामने आया, जिसने हृदय को झकझोर दिया, आंखें छलक आईं। मंच से एक और नाम पुकारा गया—एक वरिष्ठ साहित्यकार का, जो दर्शक दीर्घा में श्रोता बनकर बैठे थे। उन्हें साहित्य से गहरा अनुराग है और उनकी विनम्रता की कहानियां मैंने सुनी थीं। जब वे मंच पर आए तो उनके भावों में एक अलौकिक पवित्रता थी। उन्होंने आदरपूर्वक कवि को शॉल ओढ़ाई और फिर बिना किसी संकोच के उनके चरणों का स्पर्श किया।
यह सम्मान नहीं, श्रद्धा का समर्पण था। आज के इस दिखावे भरे दौर में, जहां स्वार्थ की तराजू पर रिश्ते तोले जाते हैं, वहां यह दृश्य मन को छू गया। यह उस व्यक्ति की कविता के प्रति उनका गहरा प्रेम था। उन्होंने फोटो खिंचवाने के लिए चेहरा तक सामने नहीं किया, मानो वे इस पवित्र क्षण को किसी कैमरे की कैद में नहीं, बल्कि अपने हृदय में बसाना चाहते हों। उनका मिलन, श्रद्धा की अविरल धारा बनकर बह रहा था। क्या आप उन वरिष्ठ साहित्यकार का नाम जानना चाहेंगे? चलिए बता देता हूं। वे हैं साहित्य सृजन संस्थान के अध्यक्ष वीर अजीत शर्मा जी, जो वर्षों से नए-पुराने साहित्यकारों को मंच दे रहे हैं।
यह क्षण एक बड़ी सीख दे गया। जब मित्रता और आपसी संबंध स्वार्थ के धुंधलके में खो रहे हैं, ऐसे में निःस्वार्थ प्रेम और सच्ची श्रद्धा की ऐसी झलक मिल जाए तो मन भावविभोर हो उठता है। यह दिखाता है कि साहित्य सिर्फ शब्दों का खेल नहीं, बल्कि हृदय से हृदय का मिलन है, जहां एक कलाकार का सम्मान उसकी कला के प्रति सच्ची आस्था से किया जाता है।
- राजकुमार धर द्विवेदी रायपुर