पुस्तक समीक्षा कृति - गांव चलें हम कृतिकार - डा. प्रशांत कानस्कर समीक्षक - डॉ दीनदयाल साहू प्रकाशक - शेफाली मीडिया पब्लिकेशन ग्रुप

पुस्तक समीक्षा 
कृति - गांव चलें हम 
कृतिकार - डा. प्रशांत कानस्कर 
समीक्षक - डॉ दीनदयाल साहू 
प्रकाशक - शेफाली मीडिया पब्लिकेशन ग्रुप
मूल्य -300 रुपए 
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बैलों को चारा नहीं ,नदियों में नहीं धारा 
खेत है गिरवी और ...भटके गंगू मारा मारा - गांव चले हम 
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मीडिया जगत में राष्ट्रीय स्तर अपनी पहचान बनाने वाले जुझारू और खोजी पत्रकारिता में डा प्रशांत कानस्कर का नाम उल्लेखनीय है। लोकप्रिय अखबार में कार्य करते राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त करने वाले इस लेखक ने ग्रामीण पत्रकारिता को जीया है। आप अपने लेखनी में ग्रामीण स्तर में जीवन यापन, प्रकृति चित्रण, गरीबी, शोषण और भुखमरी को समाज के सामने लाने में कोई कमी नहीं की। आप एक सफल गीतकार भी हैं, जिसमें किसानों की भावनाओं का उदगार है। आपकी भावनाएं अब एक कृति ' गांव चलें हम ' के माध्यम से जन समक्ष आ चुकी है। इस कृति में आपने गीत, गजल, कविताओं और मुक्तकों को शामिल किया है। माता पिता को पुष्पांजलि अर्पित करते ज्ञान की देवी माता सरस्वती की आराधना से आप अपनी कलम को आगे बढ़ाते हैं। इसके बाद विघ्नविनाशक गणेशजी की स्तुति करते हैं। तत्पश्चात होली पर्व से अपनी रचना कर्म को आगे पीलेपबढ़ाते हैं। आपने किसान की पीड़ा इस तरह व्यक्त किया है -
बैलों को नहीं चारा,
नदियों में नहीं धारा,
खेत है गिरवी और...
भटके गंगू मारा मारा।
सरल और सीधे रूप में पाठकों के बीच अपनी बात को गीत के रूप में रखने में आप सफल साबित हुए हैं। कम शब्दों में आपकी भावनाएं इस तरह चित्रित हुई हैं -
बगिया के फूल है।
कांटे भी कबूल है।।
तन में त्रिशूल है।
मन भी मृदुल है।।
कोयल की कुटिया में, कौए की काव हूं।
थोड़ा थोड़ा शहर हूं थोड़ा थोड़ा गांव हूं।
प्रकृति प्रेम आपके जीवन का अंग है। प्रकृति के रहस्यों को समझने का आपने अच्छा प्रयास किया है। हम प्रकृति से सब कुछ लेते हैं, बदले में उसे देते क्या है? यह विचारणीय है। इसका उत्तर इतना सहज भी नहीं है। हर किसी का जीवन सावन की तरह हरा भरा हो... यह हम सभी चाहते हैं पर चाहने भर से कुछ नहीं होने वाला। इसे सजाने और संवारने की जिम्मेदारी किसी न किसी रूप में हम पर है, जिसे कवि इस तरह लिखते हैं -
सुख दुख के राही , सागर के दो छोर।
दूरियां जरूर लेकिन, बंधन नहीं कमजोर।
हर मौसम में मांझी, गा रहा है गीत।
ज्वार भाटे सा जीवन, लहरों का है जोर।
अपने जीवन के हर क्षण को कानस्कर जी ग्रामीण जीवन शैली और समस्याओं से बाहर निकलने के लिए प्रयासरत हैं, यह उनकी कविता की हर पंक्ति से स्पष्ट हो जाता है। आपकी एक सफल लेखक के समाज में स्थान मिले और पत्रकारिता के माध्यम से किसानों की समस्या के साथ उनके जायज मांगों के लिए आवाज उठाते रहे। आपकी यह कृति समाज में पाठकों को पढ़ने के लिए उद्वेलित करती रहेगी। इस सफल कृति के लिए लेखक को अनंत शुभकामनाएं और बधाई ...।

Likesh khunte

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