लक्ष्मीनारायण लहरे
रायपुर ।साहित्य सृजन संस्थान द्वारा लगातार जारी 40 वीं मासिक काव्य संध्या,पुस्तक विमोचन एवं सम्मान समारोह 21दिसंबर को दोपहर 3 बजे से शाम 7 बजे तक वृंदावन हॉल, सिविल लाइन्स रायपुर में आयोजित हुई ।सुषमा पटेल की सरस्वती वंदना से प्रारंभ होकर गीतों की गूंज से संपन्न हुआ।जिसमें छत्तीसगढ़ के विभिन्न शहरों एवं राजधानी से पधारे कवियों की रचनाओं से वृंदावन हॉल तालियों से गूंजता रहा।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ.संजय अलंग पूर्व आईएएस ,शीलकांत पाठक ,वरिष्ठ साहित्यकार एवं पुस्तक समीक्षक, एवं राजकुमार धर द्विवेदी वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार, विशिष्ठ अतिथि रहे। कार्यक्रम अध्यक्ष वीर अजीत शर्मा एवं संचालन ममता खरे मधु द्वारा किया गया।
श्रीमती धनेश्वरी सोनी "गुल "को साहित्य सृजन श्रेष्ठ रचनाकार सम्मान, एस.एन. जोशी को साहित्य सृजन श्रेष्ठ काव्य पाठ सम्मान एवं कु.तुलसी साहू को साहित्य सृजन युवा काव्य पाठ सम्मान से सम्मानित किया गया।
उमेश कुमार सोनी" नयन" संयोजक एवं विजय कुमार कोसले की पुस्तकों का विमोचन काव्य संध्या के मध्य वृंदावन हॉल में हर्षौल्लास से संपन्न हुआ।
कार्यक्रम में हबीब खान समर,मनोज यादव, आर के शिवपुरी,मधुकर राव,उत्तम देवहरे , प्रदर्शना शुक्ला, एच एस ठाकुर,सत्येंद्र तिवारी सकुति,अजय जैन,मुकुल वर्मा,मयूराक्षी मिश्रा, शुभा शुक्ला निशा,काजल वस्त्रकार,मंजूषा अग्रवाल,अनामिका शर्मा शशि, डॉ.मृणालिका ओझा,अदिति तिवारी, डॉ. सुशांत पाण्डेय,रीता कोस्टा,धनेश्वरी,पुरुषोत्तम कोस्टा,सरोज सप्रे,राम किशोर यादव,हीना लखीसरानी,तुलसी साहू,विनोद जालान, डॉ.युक्त राजश्री,अशोक खरियार,अजय सोनी,डॉक्टर चंद जैन,राजेश बत्ता,यशवंत यदु,शरदेंदु झा,अनीता झा,राजकुमार पाण्डेय ने उपस्थित दर्ज कर कर काव्य पाठ का आनंद लिया।इस कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण कु.राजश्री रौतिया उम्र 6 वर्ष का भारत के संविधान एवं कु. आराध्या शर्मा उम्र 10 वर्ष का काव्य पाठ एवं साड़ी पहनकर आई महिलाओं में लॉटरी द्वारा सर्प्राइज गिफ्ट श्रीमती शुभा शुक्ला निशा को सम्मानित किया गया।
काव्य संध्या की कुछ काव्य पाठ की विशेष झलकियां निम्न है।
नोनी के नाव सुन के दुकालू उठगे,
कईथे नोनी म मोरे पराने रइथे।
ये पराने रईथे रे सुन बही मोर,
नोनी म मोरे पराने रईथे।।
विरेन्द्र शर्मा "अनुज"
कठपुतली नहीं हूं तेरे हाथ की
मैं भी एक देह हूं एहसास की।
मैं मां हूं बहन हूं बेटी हर रिश्ते की परछाई,
क्यों सीढी बनाते हो व्यापार की तुम मुझको भाई।
,___विजया पांडेय
कमाल करते हो”
ख़ामोशी में भी सवाल, करते हो,
तुम! वाक़ई कमाल , करते हो।
कभी इश्क़वार, कभी इनकार करते हो,
तानों से ही इश्क़ का कारोबार करते हो।
धड़कनों को तार-तार करते हो,
फिर भी बातें बेशुमार करते हो।
___कश्विता जालान
" परदेस में बेटे को बहुत याद आती हैं, माँ के हाथों की बनी करारी रोटियां. दुनिया की किसी रोटी में वो स्वाद ही नहीं, माँ प्यार से बनाती लाजवाब रोटियां. - ----- एस. एन. जोशी.
आम से खास बनाने की जरूरत क्या थी?
फिर ये अहसास दिलाने की जरूरत क्या थी?
जो भी सोचा था वो पूरा न हुआ काम सनम,
हाल ए दिल सबको बताने की ज़रूरत क्या थी?
रामचन्द्र श्रीवास्तव
बादल
है
तो बरसेगा ही
ऐसा कहते थे लोग
और
दादी - नानी से सुना
सच कहते थे लोग।
दादी - नानी यह भी कहतीं हैं
न रहे वैसे लोग
और बादल भी
अब कहॉं दिखते हैं ऐसे
कि कहा जा सके
हैं, तो बरसेंगे ही।
राजेंद्र ओझा
धुंध या धुंआ-धुंआ
उठ रहा गुबार है !
अदृश्यता घनी-घनी
दृष्टि ना आर-पार है
रास्ते कहां-कहां
ढूंढते यहां-वहां
रास्ते यहां-वहां
हम ढूंढते कहां-कहां
ख्वाहिशें बड़ी-बड़ी
छोटा लगता ये जहां
प्रयत्न, यत्न-यत्न से
खुलता हर द्वार है
___यशवंत चतुर्वेदी
नमक कभी सवाद है तो कभी बेश्वाद भी है
नमक हराम नामक हलालो सॉन्ग एक संवाद भी है
नमक की कमी या आती होने पर फेंकी जाती है थालियां
मां बहनों और रसोइया को दी जाती है गलियां
डा बीना सिंह रागी
बेटियां तो है माँओं की परछाइयाँ
ये ही घर की हंसी और शहनाइयाँ
दूर होती है इनसे ही यारों सुनो
माँ के मन की थकन और तन्हाइयाँ
पंखुरी मिश्रा
रोज़ एक नई कविता सुनाने पर,
घरवाली का मूड सिरे से उखड़ गया,
और उसने बिना किसी से सलाह लिए,
मुझ पर घरेलू हिंसा का मुकदमा जड़ दिया।
... राजेश जैन 'राही'
शजर फलदार हो तो झुकना उसकी फ़ितरत होती है।
बड़े इंसानों की दुनिया में, यही तो सिफ़त होती है।।
मिली थोड़ी सी शोहरत और वो मग़रूर हो बैठे, ।
मगर जो असल राही हैं, उन्हें तो बस सफ़र की चाहत होती है।।
*सीमा पाण्डेय*
किसने कहा और नया अरमान बाकी है,
जख़्म पुराने का अभी निशान बाकी है।
राकेश अग्रवाल
जीवन मे चाहत अनंत है,इनका कोई अन्त नहीं।
चाहे जितना पीछे भागो,इनका कोई छोर नहीं।
अशोक खरे 'आशु'
सत के रद्दा आव जी, गुरु के बिनी गाव जी।
मनखे-मनखे एक हे, सत के कथा अनेक हे।।
हरमन कुमार बघेल
“उम्मीद है आपसे कभी रूठ न जाना,
सीखना है हमको दुनिया में जीना” —
का वाचन कर भावुक वातावरण बना दिया।
____रत्ना रौतिया
मां के लिये कुछ लिखूँ ,लेखनी में वो धार नहीं।
मां के बिन परिवार लगता परिवार नहीं।
देने को सारी खुशियाँ जिसने,अपना सबकुछ वार दिया,
भूल जाऊँ उसके कर्तव्य,मेरा ऐसा व्यवहार नहीं।
ममता खरे 'मधु'
खुद ही खुद गाती रहती हूं मेरी कविताएं।
लिख लिखकर छपवाती रहती हूं मेरी कविताएं।
समय नहीं है पास किसी के जो सुन ले मेरी कविताएं।
बच्चे भी भाग जाते हैं बिना सुने मेरी कविताएं।
धनेश्वरी सोनी 'गुल', बिलासपुर
गुजर गया दिसंबर यूं ही,
उदासी भरी पनाहों में,
भटक रहे तुम बिन हम,
सुनी अंधेरी राहों में,
वन्दना ठाकुर
पुलिस अधिकारी-
डर मत बोल, आवाज़ खोल,
क़ानून तेरे संग है।
आँसू पोंछ, सच को सोच,
न्याय अभी जीवित रंग है।
पीड़ित महिला कहती है.
डर से काँपे मन की डोर,
रातें मुझको खाए हैं।
सच कहने की चाह में,
हज़ार सवाल सताए हैं।
किससे कहूँ, कैसे कहूँ,
हर राह मुझे अनजान लगे।
डॉ.वेणुधर रौतिया
ये दिल उदास है तेरे दर्शन की आस में
कितना अधिक सुकूँ है तेरे प्रेम-पाश में
हो जाते हैं समाप्त मेरी ऊर्जा के स्रोत
मत जाया कर ऐ यार तू अज्ञातवास में
(आर डी अहिरवार)
"थोड़ी सी मन की बात"
मैं रोज -रोज मरती हूं,
पर मुस्कान की माला पहनकर जीती हूं।
पर बाहर हंसी की छाया होती है।
भीड़ भरे सन्नाटे में,
मन मेरा अकेला खड़ा है।
कल्याणी तिवारी "कोकि"
लगातार कवियों की कविताओं की गूंज बहती रही । अपने अपने कविताओं में कवि अपनी बातों को रखने का पूरा प्रयास करते रहे ।